गुरुगोविन्दसिंहः | Devvani Sanskrit class 7 chapter 5
गुरुगोविन्दसिंहः | Devvani Sanskrit class 7 chapter 5
गुरुगोविन्दसिंहः
गुरुगोविन्दसिंहः सिक्खधर्मस्य दशमः अन्तिमश्च गुरुः आसीत् । १६६६ तमे वर्षे कार्त्तिकशुक्लसप्तम्यां तस्य जन्म पटनानगरे अभवत्।
हिंद में :- गुरु गोबिंद सिंह सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु थे। उनका जन्म कार्तिक शुक्ल सप्तमी, 1666 को पटना में हुआ था।
गुजरी तस्य माता, महात्यागी समाजसेवकः गुरुतेगबहादुरः तस्य पिता च आस्ताम्। पिता इव गुरुगोविन्दः अपि समाजसेवानिरतः आसीत्।
हिंद में :- गुजरी उनकी माता थीं और महान बलिदानी सामाजिक कार्यकर्ता गुरु तेग बहादुर उनके पिता थे। अपने पिता की तरह गुरु गोविंद भी समाज सेवा में लगे रहे।
तस्य शौर्यं, धैर्यं, त्यागः, दूरदृष्टिः सेवाभावनादिकं विशिष्टम् आसीत्। सः आबाल्यात् जनानां शक्तिं जागरयितुम् आत्मविश्वासेन कार्यं कृतवान्।
हिंद में :- उनका साहस, धैर्य, त्याग, दूरदर्शिता और सेवा भावना विशिष्ट थी। उन्होंने बचपन से ही लोगों की शक्ति को जागृत करने के लिए आत्मविश्वास से काम किया।
तस्मिन् समये भारते भारतीयसंस्कृते: विनाशकस्य क्रूरस्य मुगलशासकस्य औरङ्गजेबस्य शासनमासीत्। तादृशस्थितौ दुष्टशक्तिं निग्रहितुं प्रजासु धर्मजागरणं कृतवान्। पीडयमानानां जनानां सङ्घटनं रचितवान्।
हिंद में :- उस समय भारत पर भारतीय संस्कृति के विनाशक क्रूर मुगल शासक औरंगजेब का शासन था। ऐसी स्थिति में बुरी शक्ति पर लगाम लगाने के लिए उन्होंने लोगों में धार्मिक जागृति पैदा की। उन्होंने उत्पीड़ित लोगों का एक संगठन बनाया।
सामान्यजनानां विचारेषु परिवर्तनमानीतवान् आत्मविश्वासं च जनयितुं प्रोत्साहं दत्तवान्। देशहिताय आत्मरक्षणाय च खड्गं धरन्तु इति आदिष्टवान्। सः खालसा पंथस्य स्थापनां कृतवान्।
हिंद में :- उन्होंने आम लोगों की मानसिकता में बदलाव को पहचाना और उन्हें आत्मविश्वास बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने उन्हें देश के कल्याण और आत्मरक्षा के लिए तलवार उठाने का आदेश दिया। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।
खालसा दीक्षां स्वीकृत्य न केवलं खड्गम् अपितु पञ्च बाह्यचिह्नानि धर्तुम् गुरुगोविन्दः आदिष्टवान्। तानि च केशबन्धनं, कङ्कतिका स्थापनं, कङ्कणधारणं, कट्यां वस्त्रधारणं सर्वदा खड्गधारणमिति।
हिंद में :- गुरु गोविंद ने खालसा को दीक्षा स्वीकार करने और न केवल तलवार बल्कि पांच बाहरी निशान पहनने का आदेश दिया। इनमें बाल बांधना, कंगन पहनना, कंगन पहनना, कमर पर कपड़े पहनना और हमेशा तलवार पहनना शामिल है।
एतानि चिह्नानि समर्पण, परिशुद्धता, दैवभक्तिः, शीलं, शौर्यम् इत्येतान् भावान् स्मारयन्ति। गुरुगोविन्दसिंहेन प्रवर्तित: खालसा नाम ईश्वरीयदीक्षा ।
हिंद में :- ये प्रतीक हमें समर्पण, पवित्रता, ईश्वर के प्रति समर्पण, सदाचार और साहस की याद दिलाते हैं। खालसा नामक दिव्य दीक्षा की शुरुआत गुरु गोविंद सिंह ने की थी।
ईश्वरस्य निश्चल-आराधने एव तीर्थयात्रा, दानं दया तपः, संयमनञ्च अस्तीति यः भावयति यस्य हृदये पूर्णज्योतिषः प्रकाशोऽस्ति सः एव खालसा भवति ।
हिंद में :- जो व्यक्ति तीर्थयात्रा, दान, दया, तपस्या और संयम को ईश्वर की स्थिर पूजा में समझता है और जिसके हृदय में पूर्ण प्रकाश का प्रकाश है, वह खालसा बन जाता है।
गुरुगोविन्दसिंहः वीररसस्य सहजकविः आसीत् । तस्य “चण्डीचरितम्” इति काव्ये सः “स्वयं वीरगतिं प्राप्नुयाम” इति प्रेरणावाक्यैः समाजं प्रेरितवान्।
हिंद में :- गुरु गोविंद सिंह वीर रस के सहज कवि थे। उन्होंने अपनी कविता “चंडीचरितम्” में प्रेरणादायक शब्दों से समाज को प्रेरित किया, “आइए हम स्वयं वीर पथ प्राप्त करें।”
“विचित्रनाटकम्” इति पुस्तके सः स्ववीरगाथां सूचितवान् । गुरुगोविन्दसिंह: वीरभक्तः आसीत्। सः हिन्दूशक्तिं सङ्घटितवान्। सर्वे समाना: एकमेव भगवतः ज्योतिः सर्वेषु ज्वलति इति तस्य अचलः विश्वासः आसीत्।
हिंद में :- “स्ट्रेंज ड्रामा” पुस्तक में उन्होंने अपनी वीरतापूर्ण कहानी सुझाई है। गुरु गोविंद सिंह : ये एक वीर भक्त थे। उन्होंने हिंदू शक्ति को संगठित किया। उनका अटूट विश्वास था कि सभी समान हैं: भगवान की एक ही रोशनी सभी में चमकती है।
सज्जनानां संरक्षणाय दुष्टानां विनाशाय “खड्गं गृहीत्वा युद्धं कुरु” खैड्गस्य जयोऽस्तु” इति निनाद कुर्वन् बहूनि युद्धानि कृतवान् । १६८९ वर्षस्य एप्रिलमासतः मृत्युपर्यन्तं शत्रून् भायितवान् तेषां हृदयेषु कम्पनं जनितवान् हिन्दूधर्मञ्च संरक्षितवान् ।
हिंद में :- उन्होंने अच्छे लोगों की रक्षा करने और दुष्टों को नष्ट करने के लिए कई लड़ाइयाँ लड़ीं, चिल्लाते हुए कहा, “तलवार लो और लड़ो, ‘खैद्गा की जय!’ अप्रैल 1689 से, उन्होंने अपनी मृत्यु तक अपने दुश्मनों को डराया, उनके दिलों को कांप दिया और हिंदू धर्म की रक्षा की।
४२ तमे वयसि १७०८ तमे वर्षे अक्टोबरमासस्य सप्तमे दिनाङ्के महाराष्ट्रस्य “नान्देड़” इति स्थाने गुरुगोविन्दः मुक्तिं प्राप्तवान् तस्य उद्घोषं स्मरामः
हिंद में :- हमें 7 अक्टूबर 1708 को 42 वर्ष की आयु में महाराष्ट्र के “नांदेड़” में गुरु गोविंद की मुक्ति की घोषणा याद है।
‘खालसा ईश्वरीयः भवति – ईश्वरस्य विजयः निश्चितः “
हिंद में :- ‘खालसा दिव्य है – भगवान की जीत निश्चित है’
संकलनात्मकं मूल्याङ्कनम् |
गुरुगोविन्दसिंहः | Devvani Sanskrit class 7 chapter 5 अभ्यासः प्रशन :- पाठ 4
प्रश्न 1.
१. एकपदेन उत्तरं लिखत ( एक शब्द में उत्तर लिखो – )
(क) सिक्खानाम् दशमः गुरुः कः आसीत्? [सिक्खों के दसवें गुरु कौन थे? ]
उत्तर: गुरुगोविन्दसिंहः
(ख) मातुः नाम किम् ? ( गुरुगोविन्दसिंह की माता का नाम क्या था? )
उत्तर: गुजरी:
(ग) गुरुगोविन्दसिंहस्य पितुः नाम किम्? ( गुरु गोविंद सिंह के पिता का क्या नाम है? )
उत्तर: गुरू तेगबहादूर:
(घ) ईश्वरीयदीक्षा का? ( दिव्य दीक्षा क्या है? )
उत्तर: खालसा
(ङ) सिक्खानां प्रथमः गुरुः क: आसीत्? ( सिक्खों के प्रथम गुरु कौन थे? )
उत्तर: गुरुनानकः
(च) गुरुगोविन्दसिंहस्य मुक्तिः कुत्र अभवत्? ( गुरुगोविन्दसिंह की मुक्ति कहाँ हुई थी? )
उत्तर: नान्देड़ प्रान्ते
(छ) सिक्खधर्मप्रवर्तकः कः आसीत्? ( सिख धर्म के प्रवर्तक कौन थे? )
उत्तर: गुरुनानकः
२. एकवाक्येन उत्तरं लिखत ( एक वाक्य में उत्तर लिखो )
(क) सिक्खानां पञ्च बाह्यचिह्नानि कानि ? ( सिक्खों के पाँच बाहरी चिह्न कौन-कौन से हैं? )
उत्तर: सिक्खानां पञ्च बाह्य चिह्नानि केशबन्धनं, कङ्कतिका अस्थापनं, कङ्कणधारणं, कट्यां वस्त्रधारणं, सर्वदा खड्गंधारणम् इति।
( सिक्खों के पाँच बाहरी चिह्न हैं- केशबन्धन (पगड़ी), कंघी रखना, कड़ा धारण करना, कमर में फेंटा बांधना, सदा तलवार धारण करते रहना । )
(ख) गुरुगोविन्दस्य जननं कदा अभवत्? ( गुरुगोविन्द का जन्म कब हुआ थ? )
उत्तर: गुरुगोविन्दस्य जननं १६६६ तमे वर्षे कार्तिक शुक्ल सप्तम्यां पटना नगरे अभवत्।
( गुरुगोविन्द का जन्म सन् 1666 ई. में कार्तिक महीने की शुक्लपक्ष की सप्तमी को पटना नगर में हुआ था। )
(ग) मुगलाः कीदृशाः आसन् ? ( मुगल कैसे थे? )
उत्तर: मुगलः क्रूरः शासकः आसीत् । ( मुगल क्रूर शासक था। )
(घ) सिक्खानां नवमः गुरुः कः आसीत्? ( सिखों के नौवें गुरु कौन थे? )
उत्तर: श्री गुरु तेग बहादुर: सः सिक्खानां नवमः गुरुः आसीत् । ( श्री गुरु तेग बहादुर जी सिखों के नौवें गुरु थे। )
(ङ) कुत्र धर्माः विकासं प्राप्ताः ? ( धर्मों ने कहाँ पर विकास प्राप्त किया है? )
उत्तर: भारते बहवः धर्माः विकास प्राप्ताः । ( भारत में बहुत से धर्मों ने विकास प्राप्त किया है । )
प्रश्न 3.
३. कोष्ठकपदानि उपयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत ( कोष्ठक के शब्दों का प्रयोग करके खाली स्थानों को भरो )
गुरुजी, आत्मविश्वासेन, खड्गं, भगवतः ईश्वरीयः, |
क) एकमेव…………. ज्योतिः सर्वेषु ज्वलति ।
उत्तर: भगवतः
(ख) गुरुगोविन्दसिंह:…………….. कार्यं कृतवान् ।
उत्तर: आत्मविश्वासेन,
(ग) खालसा………………… भवति ।
उत्तर: ईश्वरीयः
(घ) ……………….. गृहीत्वा युद्धं कुरु।
उत्तर: खड्गं
(ङ)वाहे ……….. की फतह ।
उत्तर: गुरुजी
प्रश्न 4.
४. सम्बोधनं लिखत : ( सम्बोधन लिखो )
शब्द: | पुल्लिङ्ग | स्त्रीलिङ्गे |
आचार्य | हे आचार्य ! | हे आचार्ये । |
गुरु | …………………… | …………………… |
आर्य | …………………… | …………………… |
महोदय | …………………… | …………………… |
अनुज | …………………… | …………………… |
उत्तर: ( सम्बोधन लिखो )
शब्द: | पुल्लिङ्ग | स्त्रीलिङ्गे |
आचार्य | हे आचार्य ! | हे आचार्ये । |
गुरु | हे गुरु ! | हे गुरुर्ये । |
आर्य | आर्य! | आर्ये!, |
महोदय | महोदय!, | महोदये!, |
अनुज | अनुज ! | अनुजे! |
प्रश्न 5.
४. उचितं मेलनं कुरुत ( उचित का मेल करो )
उत्तर:
उत्तर:
(क) ⇒ 5
(ख) ⇒ 4
(ग) ⇒ 2
(घ) ⇒ 1
(ङ) ⇒ 3
रचनात्मकं मूल्याङ्कनम् |
प्रश्न 6.
६. क्रमशः स्थापयत ( क्रम स्थापित करो )
(क) गुरुगोविन्दसिंहः हिन्दूशक्ति सङ्घटितवान्।
(ख) गुरुगोविन्दस्य मृत्युः १७०८ तमे वर्षे अभवत् ।
(ग) माता गुजरी पिता तेगबहादुरः च आस्ताम् ।
(घ) गुरु नानकः सिक्खधर्मप्रवर्तकः आसीत् ।
(ङ) गुरुगोविन्दस्य जननम् कार्तिकशुक्लसप्तम्याम् अभवत् ।
उत्तर:
(घ) गुरु नानकः सिक्खधर्मप्रवर्तकः आसीत्।
(ङ) गुरुगोविन्दस्य जननम् कार्तिकशुक्लसप्तम्याम् अभवत्।
(ग) माता गुजरी पिता तेगबहादुरः च आस्ताम् ।
(क) गुरुगोविन्दसिंहः हिन्दूशक्ति सङ्घटितवान्।
(ख) गुरुगोविन्दस्य मृत्युः १७०८ तमे वर्षे अभवत् ।
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