यूरोप में राष्ट्रवाद | bihar board class 10th history ch 1 books

यूरोप में राष्ट्रवाद | bihar board class 10th history ch 1 books

यूरोप में राष्ट्रवाद | bihar board class 10th history ch 1 books

यूरोप में राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद:

राष्ट्रवाद आधुनिक विश्व की राजनैतिक जागृति का प्रतिफल है। यह एक ऐसी भावना है जो किसी विशेष भौगोलिक, सांस्कृतिक या वाहक बनती है। सामाजिक परिवेश में रहने वाले लोगों में एकता की राष्ट्रवाद की भावना का बीजारोपण यूरोप में पुनर्जागरण के काल से ही हो चुका था। परन्तु 1789 ई० की फ्रांसीसी क्रांति से यह उन्नत रूप में प्रकट हुई। 19 वीं शताब्दी में तो यह उन्नत एवं आक्रमक रूप में सामने यूरोप आयी। इसके कारण भी यथेष्ट थे और परिणाम भी युगान्तकारी रहे।

यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना के विकास में फ्रांस की राज्यक्रांति तत्पश्चात नेपोलियन के आक्रमणों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। फ्रांसीसी क्रांति ने राजनीति को अभिजात्यवर्गीय परिवेश से बाहर कर उसे अखबारों, सड़कों ओर सर्वसाधारण की वस्तु बना दिया। यूरोप के कई राज्यों में नेपोलियन के अभियानों द्वारा नवयुग का संदेश पहुँचा। नेपोलियन ने जर्मनी और इटली के राज्यों को भौगोलिक नाम की परिधि से बाहर कर उसे वास्तविक एवं राजनैतिक रूपरेखा प्रदान की। जिससे इटली और जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। दूसरी तरफ नेपोलियन की नीतियों के कारण फ्रांसीसी प्रभुता और अधिपत्य के विरूद्ध यूरोप में देशभक्तिपूर्ण विक्षोभ भी जगा। नेपोलियन के पतन के बाद यूरोप की विजयी शक्तियाँ ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में 1815 में एकत्र हुई। जिनका उद्देश्य यूरोप में पुनः उसी व्यवस्था को स्थापित करना था, जिसे नेपोलियन के युद्धों और विजयों ने अस्त-व्यस्त कर दिया था। परन्तु इसमें भाग लेने वाले राजनयिक इस बात को देख सकने में असमर्थ रहे कि जनतंत्र और राष्ट्रवाद की नयी शक्तियाँ राजनीति को निर्धारित करने वाले नये तत्वों के रूप में उभर रही थी।

यूरोप में राष्ट्रवाद
         नेपोलियन बोनापार्ट

 

सन् 1815 ई० के वियना सम्मेलन की मेजबानी आस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने किया, जो घोर प्रतिक्रियावादी था। इस सम्मेलन में ब्रिटेन, रूस, प्रशा और आस्ट्रिया जैसी यूरोपीय शक्तियों ने मिलकर ऐसी व्यवस्था की जिसका मुख्य उद्देश्य यूरोप में उस शांति संतुलन को स्थापित करना था जिसे नेपोलियन के युद्धों ने समाप्त कर दिया था। गणतंत्र एवं प्रजातंत्र, जो फ्रांस की क्रांति की देन थी, उसका विरोध करना और पुरातन व्यवस्था की पुर्नस्थापना करना मेटरनिख व्यवस्था का उद्देश्य था। अतः वियना सम्मेलन के माध्यम से यूरोप में नेपोलियन युग का अंत और मेटरनिख युग की शुरूआत हुई। इटली पर अपना प्रभाव स्थापित रखने के लिए मेटरनिख ने उसे कई राज्यों में विभाजित कर दिया। सिसली और नेपल्स के प्रदेश बूर्बोवंश के सम्राट फर्डिनेंड को दे दिया गया। रोम और उसके आस-पास के राज्य पौप सौंप दिए गए। लोम्बार्डी एवं वेनेशिया पर आस्ट्रिया की प्रभूता कायम हुई। परमा, मोडेना और टरकनी के प्रान्त हैब्सवर्ग राजवंश को दे गए तथा जेनेवा और सार्डिनिया पिडमाउन्ट के राज्य में सम्मिलित कर दिए गए। जर्मनी में 39 रियासतों का संघ कायम रहा जिस पर अप्रत्यक्ष रूप से आस्ट्रिया का अधिकार स्थापित किया गया तथा हर सम्भव प्रयास किया गया कि उनसे राष्ट्रीयता की भावना नही जगे। मेटरनिख ने फ्रांस में भी पुरातन व्यवस्था की पुर्नस्थापना की। इस तरह वियना सम्मेलन प्रतिक्रियावादी शक्तियों की विजय थी। लेकिन यह व्यवस्था स्थायी साबित नहीं हुई और जल्द ही यूरोप में राष्ट्रीयता भावना दिए BEL का प्रसार हुआ जिससे यूरोप के लगभग सभी देश प्रभावित हुए ।

यूरोप में राष्ट्रवाद
                                 मेटरनिख

फ्रांस में वियना व्यवस्था के तहत क्रांति के पूर्व की व्यवस्था को स्थापित करने के लिए बूर्वो राजवंश को पुर्नस्थापित किया गया तथा लुई 18 वाँ फ्रांस का राजा बना। उसने फ्रांस की बदली हुई परिस्थितियों को समझा और फ्रांसीसी जनता पर पुरातनपंथी व्यवस्था को थोपने का प्रयास नहीं किया। उसने प्रतिक्रियावादी तथा सुधारवादी शक्तियों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया तथा इसी उद्देश्य से 2 जून 1814 ई० को सम्राट की ओर से संवैधानिक घोषणापत्र जारी किये गए जो 1848 ई० तक फ्रांस में चलते रहे। चार्ल्स-X के शासनकाल में इसमें कुछ परिवर्तन किये गए परन्तु इसका परिणाम 1830 की क्रांति के रूप में सामने आया।

जुलाई 1830 की क्रांति :

चार्ल्स-X एक निरंकुश एवं प्रतिक्रियावादी शासक था जिसने फ्रांस में उभर रही राष्ट्रीयता तथा जनतंत्रवादी भावनाओं को दबाने का कार्य किया। उसने अपने शासनकाल में संवैधानिक लोकतंत्र की राह में कई गतिरोध उत्पन्न किये। उसके द्वारा प्रतिक्रियावादी पोलिग्नेक को प्रधानमंत्री बनाया गया। पोलिग्नेक ने पूर्व में लुई 18 वें द्वारा स्थापित समान नागरिक संहिता के स्थान पर शक्तिशाली आभिजात्य वर्ग की स्थापना तथा उसे विशेषाधिकारों से विभूषित करने का प्रयास किया। उसके इस कदम को उदारवादियों ने चुनौती तथा क्रांति के विरूद्ध षडयंत्र समझा। प्रतिनिधि सदन एवं दूसरे उदारवादियों ने पोलिग्नेक के विरूद्ध गहरा असंतोष प्रकट किया। चार्ल्स-X ने इस विरोध की प्रतिक्रियास्वरूप 25 जुलाई 1830 ई० को चार अध्यादेशों द्वारा उदारतत्वों का गला घोंटने का प्रयास किया। इन अध्यादेशों के विरोध में पेरिस में क्रांति की लहर दौड़ गई और फ्रांस में 28 जुन 1830 ई० से गृहयुद्ध आरम्भ हो गया इसे इसे ही जुलाई 1830 की क्रांति कहते है। परिणामतः चार्ल्स-X फ्रांस की राजगद्दी त्याग कर इंग्लैंड पलायन कर गया और इस प्रकार फ्रांस में बूर्वो वंश के शासन का अंत हो गया।

फ्रांस में जुलाई 1830 ई० की क्रांति के प परिणामस्वरूप बूर्वो वंश के स्थान पर आर्लेयेंस वंश को गद्दी सौंपी गई। इस वंश के शासक लुई फिलिप ने उदारवादियों, पत्रकारों तथा पेरिस की जनता के समर्थन से सत्ता प्राप्त की थी। अतएव उसकी नीतियाँ उदारवादियों के पक्ष में तथा संवैद्यानिक गणतंत्र के निमित्त रही।

1830 की क्रांति का प्रभाव :

इस प्रकार जुलाई की क्रांति इस बात की सूचक थी कि देश में कट्टर राजसत्तावादियों का प्रभाव कम हो रहा था। वास्तव में यह क्रांति मध्यमवर्ग और लोकसप्रभुता के सिद्धान्तों की देन थी। इस क्रांति ने फ्रांसीसी क्रांति के सिद्धान्तों को पुनर्जीवित किया तथा वियना काँग्रेस के उद्देश्यों को निर्मूल सिद्ध कर दिया। इसका प्रभाव सम्पूर्ण यूरोप पर पड़ा और राष्ट्रीयता तथा देशभक्ति की भावना का प्रस्फुटन जिस प्रकार हुआ उसने सभी यूरोपीय राष्ट्रों के राजनैतिक एकीकरण, सांवैद्यानिक सुधारों तथा राष्ट्रवाद के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इटली तथा जर्मनी का एकीकरण तथा यूनान, पोलैंड एवं हंगरी में तत्कालीन व्यवस्था के प्रति राष्ट्रीयता के प्रभाव के कारण आन्दोलन उठ खड़े हुए। आगे चलकर फ्रांस में भी लुई फिलिप के खिलाफ आवाज उठने लगी जिससे फ्रांस में एक ओर क्रांति की पृष्टिभूमि तैयार कर दी।

सन् 1848 ई० की क्रांति :

लुई फिलिप एक उदारवादी शासक था, परन्तु बहुत अधिक महत्वाकांक्षी था। उसने अपने विरोधियों को खुश करने के लिए स्वर्णिम मध्यमवर्गीय नीति का अवलम्बन करते हुए सन् 1840 में गीजो को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, जो कट्टर प्रतिक्रियावादी था। वह किसी भी तरह के वैधानिक, सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों के विरूद्ध था। लुई फिलिप ने पूँजीपति वर्ग को साथ रखना पसन्द किया जिसे शासन के कार्यों में अभिरूचि नहीं थी और जो अल्पमत में भी था। उसके पास किसी भी तरह का सुधारात्मक कार्यक्रम नहीं था और न ही उसे विदेश नीति में ही किसी तरह का सफलता हासिल हो रहा था। उसके शासन काल में देश में भुखमरी एवं बेरोजगारी व्याप्त होने लगी, जिसकी वजह से गीजों की आलोचना होने लगी। सुधारवादियों ने 22 फरवरी 1848 ई० को पेरिस में कियर्स के नेतृत्व में एक विशाल भोज का आयोजन किया। जगह जगह अवरोध लगाए गए और लुई फिलिप को गद्दी छोड़ने पर मजबूर किया गया। 24 फरवरी को लुई फिलिप ने गद्दी का त्याग किया और इंगलैंड चला गया। तत्पश्चात् नेशनल एसेम्बली ने गणतंत्र की घोषणा करते हुए 21 वर्ष से उपर के सभी वयस्क पुरूषों को मताधिकार प्रदान किया और काम के अधिकार की गारंटी दी। गणतंत्रवादियों का नेता मार्टिन एवं सुधारवादियों का नेता लुई ब्लॉ था। शीघ्र ही दोनों में मतभेद आरम्भ हो गया और लुई नेपोलियन-फ्रांस का सम्राट बना ।

इस क्रांति ने न सिर्फ फ्रांस की पुरातन व्यवस्था का अंत किया बल्कि इटली, जर्मनी, आस्ट्रिया, हालैंड, स्वीट्जरलैंड, डेनमार्क, स्पेन, पोलैंड, आयरलैंड तथा इंगलैंड भी इस क्रांति से प्रभावित हुए । इटली तथा जर्मनी के उदारवादियों ने बढ़ते हुए जन असंतोष का फायदा उठाया और राष्ट्रीय एकीकरण के द्वारा राष्ट्र राज्य की स्थापना की मांगों को आगे बढ़ाया, जो संवैधानिक लोकतंत्र के सिद्धांत पर आधारित था।

यूरोप में राष्ट्रवाद and इटली का एकीकरण :

इटली 19 वीं शताब्दी के आरम्भ में मात्र एक भौगोलिक अभिव्यक्ति था। जहाँ कई स्वतंत्र राज्य हुआ करते थे। इस कारण वहाँ अलगाव की भावना थी। इटली के एक राष्ट्र के रूप में स्थापित होने में भौगोलिक समस्या के अलावे कई अन्य समस्याएँ भी थीं। जैसे-इटली में ऑस्ट्रिया और फ्रांस जैसे विदेशी राष्ट्रों का हस्तक्षेप था। अतः एकीकरण में इनका विरोध अवश्यम्भावी था। इधर राजधानी रोम भी पोप के प्रभाव में थी। पोप की इच्छा थी कि इटली का एकीकरण स्वयं उसके नेतृत्व में धार्मिक दृष्टिकोण से हो ना कि शासकों के नेतृत्व में। इसके अलावे अनेक आर्थिक और प्रशासनिक विसंगतियाँ भी मौजूद थीं।

यूरोप में राष्ट्रवाद

Before unification of इटली

इटली

( एकीकरण के बाद इटली)

परन्तु इसके बावजूद भी 19 वीं सदी के आरम्भ से ही इटली में राष्ट्रीयता का विकास हो रहा था। फ्रांस में होने वाली घटनाओं का प्रभाव भी यहाँ स्पष्ट रूप से पड़ रहा था। नेपोलियन के सैन्य अभियानों ने इटली के नवजागरण तथा एकीकरण में अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, परन्तु महत्वपूर्ण योगदान दिया। इटली विजय के पश्चात् नेपोलियन ने इसे तीन गणराज्यों में गठित किया यथा सीसपाइन गणराज्य, लीगुलीयन तथा ट्रांसपेडेन। उसने यातायात व्यवस्था को भी चुस्त-दुरूस्त किया तथा सम्पूर्ण क्षेत्र को एक शासन के अधीन लाया। इन सभी कारणों से वहाँ जागृति आयी। नेपोलियन के पतन (1814) के पश्चात वियना काँग्रेस (1815) द्वारा इटली को पुराने रूप में लाने के उद्देश्य से इटली के दो राज्यो पिडमाउण्ट और सार्डिनिया का एकीकरण कर दिया गया। इस प्रकार इटली के एकीकरण की दिशा तय होने लगी।

इटली में 1820 ई० से ही कुछ राज्यों में सांवैधानिक सुधारों के लिए नागरिक आन्दोलन होने लगे। एक गुप्त दल ‘कार्बोनारी’ का गठन राष्ट्रवादियों द्वारा किया गया। जिसका उद्देश्य छापामार युद्ध के द्वारा राजतंत्र को नष्ट कर गणराज्य की स्थापना करना था। प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता मेजनी का संबंध भी इसी दल से था। 1830 की फ्रांसीसी क्रांति के प्रभाव से इटली भी अछूता नहीं रह सका और यहाँ भी नागरिक आन्दोलन शुरू हो गए। मेजनी ने इन नागरिक आन्दोलनों का उपयोग करते हुए उत्तरी और मध्य इटली में एकीकृत गणराज्य स्थापित करने का प्रयास किया। लेकिन ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख द्वारा इन राष्ट्रवादी नागरिक आन्दोलनों को दबा दिया गया और मेजनी को इटली से पलायन करना पड़ा।

मेजनी :  

यूरोप में राष्ट्रवाद

मेजनी साहित्यकार, गणतांत्रिक विचारों का और योग्य सेनापति था। लेकिन वह तत्कालीन राजनैतिक समर्थक परिस्थितियों की बेहतर समझ नहीं रखता था। अतः उसमें आदर्शवादी गुण अधिक और व्यवहारिक गुण कम थे। अपनी पराजय के बाद भी मेजनी ने हार नहीं मानी। 1848 में जब फ्रांस सहित पूरे यूरोप में क्रांति का दौर आया तो मेटरनिख को भी अंततः ऑस्ट्रिया छोड़ना पड़ा। इसके बाद इटली की राजनीति में पुनः मेजनी का आगमन हुआ मैजनी सम्पूर्ण बाद इटली का एकीकरण कर उसे एक गणराज्य बनाना चाहता था जबकि सार्डिनिया-पिडमाउंट का शासक चार्ल्स एलर्बट अपने नेतृत्व में सभी प्रांतो का विलय चाहता था। उधर पोप भी इटली को धर्मराज्य बनाने का पक्षधर था। इस तरह विचारों के टकराव के कारण इटली के एकीकरण का मार्ग अवरूद्ध हो गया था। कालांतर में ऑस्ट्रिया द्वारा इटली के कुछ भागों पर आक्रमण किये जाने लगे जिसमें सार्डिनिया के शासक चार्ल्स एलर्बट की पराजय हो गयी। ऑस्ट्रिया के हस्तक्षेप से इटली में जनवादी आन्दोलन को कुचल दिया गया। इस प्रकार मेजनी की पुनः हार हुई और वह पलायन कर गया।

यूरोप में राष्ट्रवाद and एकीकरण का द्वितीय चरण :

1848 तक इटली के एकीकरण के लिए किये गए प्रयास वस्तुतः असफल ही रहे परन्तु धीरे-धीरे इटली में इन आन्दोलनों के कारण जनजागरूकता बढ़ रही थी और राष्ट्रीयता की भावना तीव्र हो रही थी। इटली में सार्डिनिया-पिडमाउण्ट का नया शासक ‘विक्टर इमैनुएल’ राष्ट्रवादी विचार धारा का था और उसके प्रयास से इटली के एकीकरण का कार्य जारी रहा। अपनी नीतियों के क्रियान्वयन के लिए विक्टर ने काउंट कावूर को प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

काउंट कावूर : 

यूरोप में राष्ट्रवाद

कावूर एक सफल कूटनीतिज्ञ एवं राष्ट्रवादी था। वह इटली के प इटली के एकीकरण में सबसे बड़ी बाधा ऑस्ट्रिया को मानता था। अतएव उसने ऑस्ट्रिया को परजित करने के लिए फ्रांस के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। 1853-54 के क्रिमिया युद्ध में कावूर ने फ्रांस की ओर से युद्ध में सम्मिलित होने की घोषणा कर दी जबकि इसके लिए फ्रांस ने किसी प्रकार का आग्रह भी नहीं किया था। इसका प्रत्यक्ष लाभ कावूर को प्राप्त हुआ। युद्ध की समाप्ति के बाद पेरिस के शांति सम्मेलन में फ्रांस तथा ऑस्ट्रिया के साथ पिडमाउण्ट को भी बुलाया गया। इससे कावूर की महत्ता बढ़ गई। इस सम्मेलन में कावूर ने इटली में ऑस्ट्रिया के हस्तक्षेप को गैरकानूनी घोषित कर दिया। जिसके कारण सम्पूर्ण यूरोप का ध्यान इटली की ओर गया। इस प्रकार इटली की समस्या को कावूर ने अपनी कूटनीति के बल पर सम्पूर्ण यूरोप की समस्या बना दिया।

काबूर ने नेपोलियन III से भी एक संधि की जिसके तहत फ्रांस ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ पिडमाउन्ट को सैन्य समर्थन देने का वादा किया। बदले में नीस और सेवाय नामक दो रियासतें कावूर ने फ्रांस को देना स्वीकार कर लिया। फ्रांस ने कावूर को यह भी आश्वासन दिया कि यदि उत्तर तथा मध्य इटली की रियासतें जनमत संग्रह के आधार पर पिडमाउंट से मिलना चाहेंगें तो फ्रांस इसका विरोध नहीं करेगा। इसके लिए कावूर की आलोचना भी की जाती है कि उसने नीस तथा सेवाय नामक प्रांतों को फ्रांस को देने का आश्वासन देकर इटली की राष्ट्रीय अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया। परन्तु यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि तब तक इटली एक राष्ट्र के रूप में उभरा भी नहीं था। यदि दो प्रांतों को खोकर भी उत्तरी तथा मध्य इटली का एकीकरण हो जाता तो यह बड़ी उपलब्धि थी। क्योंकि फ्रांसीसी मदद के बिना इटली का एकीकरण कावूर की दृष्टि में संभव नहीं था ।

इसी बीच 1859-60 में ऑस्ट्रिया और पिडमाउण्ट में सीमा संबंधी विवाद के कारण युद्ध आरम्भ हो गया। युद्ध में इटली के समर्थन में फ्रांस ने अपनी सेना उतार दी जिसके कारण ऑस्ट्रियाई सेना बुरी तरह पराजित होने लगी। ऑस्ट्रिया के एक बड़े राज्य लोम्बार्डों पर पिडमाउण्ट का कब्जा हो गया। एक तरफ तो लड़ाई लम्बी होती जा रही थी और दूसरी तरफ नेपोलियन इटली के राष्ट्रवाद से घबराने लगा था क्योंकि उत्तर और मध्य इटली की जनता काबूर के समर्थन में बड़े जनसैलाब के रूप में एकीकरण के लिए आंदोलनरत थी। नेपोलियन इस परिस्थिति के लिए तैयार नहीं था। अतः वेनेशिया पर विजय प्राप्त होने के तुरंत बाद नेपोलियन ने अपनी सेना वापस बुला ली। युद्ध से हटने के बाद नेपोलियन III ने ऑस्ट्रिया तथा पिडमाउण्ट के बीच मध्यस्थता करने की बात स्वीकारी। इस तरह संधि के अनुसार लोम्बार्डी पर पिइमाउण्ड का अधिकार और वेनेशिया पर ऑस्ट्रिया का अधि कार माना गया। अंततः एक बड़े राज्य के रूप में इटली सामने आया। परन्तु कावूर का ध्यान मध्य तथा उत्तरी इटली के एकीकरण पर था। अतः उसने नेपोलियन को सेवाय प्रदेश देने का लोभ देकर ऑस्ट्रिया पिडमाउण्ट युद्ध में फ्रांस के निष्क्रिय रहने तथा इटली के राज्यों का पिडमाउण्ट में विलय का विरोध नहीं करने का आश्वासन ले लिया। बदले में नेपोलियन ने यह शर्त रख दी कि जिन राज्यों का विलय होगा वहाँ जनमत संग्रह कराये जायेगें। चूँकि उन रियासतों की जनता पिडमाउण्ट के साथ थी इसलिए कावूर ने कूटनीति का परिचय देते हुए इसे स्वीकार कर लिया। 1860-61 में कावूर ने सिर्फ रोम को छोड़कर उत्तर तथा मध्य इटली की सभी रियासतों (परमा, मोडेना, टसकनी, फब्बारा, बेलाजोना आदि) को मिला लिया तथा जनमत संग्रह कर इसे पुष्ट भी कर लिया। ऑस्ट्रिया भी फ्रांस तथा इंग्लैंड द्वारा पिडमाउण्ट को समर्थन के भय से कोई कदम नहीं उठा सका। दूसरी तरफ ऑस्ट्रिया जर्मन एकीकरण की समस्या से भी जूझ रहा था। इस प्रकार 1862 ई० तक द० इटली रोम तथा वेनेशिया को छोड़कर बांकी रियासतों का विलय रोम में हो गया और सभी ने विक्टर इमैनुएल को शासक माना।

          गैरीबाल्डी’

यूरोप में राष्ट्रवाद

इसी बीच महान क्रांतिकारी ‘गैरीबाल्डी’ सशस्त्र क्रांति के द्वारा दक्षिणी इटली के रियासतों के एकीकरण तथा गणतंत्र की स्थापना करने का प्रयास कर रहा था। गैरीबाल्डी पेशे से एक नाविक था और मेजनी के विचारों का समर्थक था परन्तु बाद में कावूर के प्रभाव में आकर संवैधानिक राजतंत्र का पक्षधर बन गया। गैरीबाल्डी ने अपने कर्मचारियों तथा स्वयं सेवकों की सशस्त्र सेना बनायी। उसने अपने सेनिकों को लेकर इटली के प्रांत सिसली तथा नेपल्स पर आक्रमण किये इन रियासतों की अधिकांश जनता बूर्वो राजवंश के निरंकुश शासन से तंग होकर गैरीबाल्डी की समर्थक बन गयी। गैरीबाल्डी ने यहाँ गणतंत्र की स्थपना की तथा विक्टर इमैनुएल के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ की सत्ता सम्भाली। वस्तुतः कावूर के विचार गैरीबाल्डी से नहीं मिलते थे परन्तु कावूर ने उसके दक्षिणी अभियान का समर्थन किया। 1862 ई० में गैरीबाल्डी ने रोम पर आक्रमण की योजना बनाई तब कावूर ने गैरीबाल्डी के इस अभियान का विरोध किया और रोम की रक्षा के लिए पिडमाउण्ट की सेना भेज दी। इसी बीच गैरीबाल्डी की भेंट कावूर से हुई और उसने रोम के अभियान की योजना त्याग दी। दक्षिणी इटली के जीते गए क्षेत्र को बिना किसी संधि के गैरीबाल्डी ने विक्टर इमैनुएल को सौंप दिया। गैरीबाल्डी को दक्षिणी क्षेत्र में शासक बनने का प्रस्ताव विक्टर इमैनुएल द्वारा दिया भी गया परन्तु उसने इसे अस्वीकार कर दिया। वह अपनी सारी सम्पति राष्ट्र को समर्पित कर साधारण किसान की भाँति जीवन जीने की ओर अग्रसित हुआ। त्याग और बलिदान की इस भावना के कारण गैरीबॉल्डी के चरित्र को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान खूब प्रचारित किया गया तथा लाल लाजपत राय ने उसकी की जीवनी लिखी।

1862 ई० में दुर्भाग्यवश कावूर की मृत्यु हो गई और इस तरह वह भी पूरे इटली का एकीकरण नहीं देख पाया। रोम तथा वेनेशिया के रूप में शेष इटली का एकीकरण विक्टर इमैनुएल 1862 ई० तक द० इटली रोम तथा वेनेशिया को छोड़कर बांकी रियासतों का विलय रोम में हो गया और सभी ने विक्टर इमैनुएल को शासक माना। ने स्वयं किया। 1870-71 में फ्रांस और प्रशा के बीच युद्ध छिड़ गया जिस कारण फ्रांस के लिए पोप को संरक्षण प्रदान करना संभव नहीं था। विक्टर इमैनुएल ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया। पोप ने अपने आप को बेटिकन सिटी के किले में बंद कर लिया। इमैनुएल ने पोप के राजमहल को छोड़कर बाकी रोम को इटली में मिला लिया और उसे अपनी राजधानी बनायी इस नई स्थिति को पोप ने तत्काल स्वीकार नहीं किया। इस समस्या का अंततः मुसोलिनी द्वारा निदान हुआ जब उसने पोप के साथ समझौता कर वेटिकन की स्थिति को स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार 1871 ई० तक इटली का एकीकरण मेजनी, कावूर, गैरीबाल्डी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं एवं विक्टर इमैनुएल जैसे शासक के योगदानों के कारण पूर्ण हुआ। इन सभी घटनाओं के पार्श्व में राष्ट्रवादी चेतना सर्वोपरी थी।

यूरोप में राष्ट्रवाद and जर्मनी का एकीकरण:

इटली के एकीकरण के दौरान ही जर्मन क्षेत्र में भी समान प्रक्रियाएँ चल रही थी। अतः दोनो देशों का एकीकरण लगभग साथ-साथ ही सम्पन्न हुआ।

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जर्मनी मध्यकाल (लगभग 800 ई०) में शार्लमा के नेतृत्व में संगठित होकर लम्बे समय तक सुदृढ अवस्था में रहा। परन्तु आधुनिक युग के आते-आते जर्मनी पूरी तरह से विखंडित राज्य था जिसमें लगभग 300 छोटे-बड़े राज्य थे। उनमें राजनीतिक सामाजिक तथा धार्मिक विषमताएँ भी मौजूद थीं। उत्तर जर्मन राज्यों में जहाँ प्रोटेस्टेंट मतावलम्बियों की संख्या ज्यादा थी। वहाँ प्रशा सबसे शक्तिशाली राज्य था एवं अपना प्रभाव बनाए हुए था। दूसरी तरफ दक्षिण जर्मनी के कैथेलिक बहुल राज्यों की प्रतिनिधि सभा ‘डायट’ जिन्दा थी, जहाँ सभी मिलते थे। परन्तु उनमें जर्मन राष्ट्रवाद की भावना का अभाव था, जिसके कारण एकीकरण का मुद्दा उनके समक्ष नहीं था। वस्तुतः जर्मन एकीकरण की पृष्ठभूमि निर्माण का श्रेय नेपोलियन बोनापार्ट को दिया जाता है क्योंकि उसने 1806 ई० में जर्मन प्रदेशों को जीत कर राईन राज्य संघ का निर्माण किया की भावना धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। इसी दौरान र्जमनी में बुद्धिजीवियों किसानों तथा था और यहीं से जर्मन राष्ट्रवाद कलाकारों जैसे हीगेल काण्ट, हम्बोल्ट, ना कलाकारों अन्डर्ट, जैकब ग्रीम आदि ने जर्मन राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया। हीगल ने ऐतिहासिक द्वंदवाद की व्याख्या करते हुए जर्मन राष्ट्रवाद के विकास में भूमिका निभाई। प्रशा का चांसलर विस्मार्क हीगेल के विचारों से, काफी प्रभावित था। अंडर्ट ने कविताओं के माध्यम से देशभक्ति जागृत की। हर्डेनवर्ग तथा नोवोलिस ने जर्मनी के गौरवमय अतीत को सामने रखा। चित्रकारों ने जर्मन संस्कृति को उजागर किया। उन्होंने ने नायक नायिकाओं की जीवंत चित्रों द्वारा भी राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया। इस प्रकार अब जर्मनी भी सामंतवादी व्यवस्था से पूरी तरह निकल कर आधुनिक युग में प्रवेश करने को तैयार हुआ। जर्मनी में राष्ट्रीय आन्दोलन में शिक्षण संस्थानों एवं विद्यार्थियों का भी योगदान था। शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने जर्मनी एकीकरण के उद्देश्य से ब्रूशेन शैफ्ट नामक सभा स्थापित की। वाइभर राज्य का येना विश्वविद्यालय राष्ट्रीय आन्दोलन का केन्द्र था। यद्यपि मेटरानिख ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए दमनकारी कानून कार्ल्सवाद के आदेश (Carlsbad Decrees) को जारी किया, परन्तु फिर भी जर्मनी के राष्ट्रीयता की प्रबल धारा प्रवाहित हो रही थी जिसने एकीकरण के काम को आगे बढ़ाने में सहायता प्रदान की।

इसी परिपेक्ष्य में एकीकरण की आर्थिक परिस्थितियाँ भी निर्मित हो रही थीं। 1834 में जर्मन व्यापारियों ने आर्थिक व्यापारिक समानता के लिए प्रशा के नेतृत्व में जालवेरिन नामक आर्थिक संघ बनाया जिसके विषय में कहा जाता है कि उस संघ ने जर्मन क्षेत्रीय आदतों को कुचल कर राष्ट्रवादी प्रवृतियों को बढ़ावा दिया। इसके बावजूद जर्मन राष्ट्रवादी अभी तक संगठित नहीं हो पाये थे। फ्रांस की 1830 की क्रांति ने जर्मन राष्ट्रवादी भावनाओं को कुछ हवा जरूर दी। सेंक्सीनी, हनोवर आदि राज्यों में लोकतांत्रिक विद्रोह होने लगे थे परन्तु प्रशा और ऑस्ट्रिया ने मिलकर इसे कुचल डाला था।

1848 की फ्रांसीसी क्रांति ने जर्मन राष्ट्रवाद को एक बार फिर भड़का दिया। दूसरी तरफ इस क्रांति ने मेटरानिख के युग का अंत भी कर दिया था। इसी समय जर्मन राष्ट्रवादियों ने वान गोगेर्न के नेतृत्व में मार्च 1848 को पुराने संसद की सभा को फ्रैंकफर्ट में बुलाया। जहाँ यह निर्णय लिया गया कि प्रशा का शासक फ्रेडरिक विलियम जर्मन राष्ट्र का नेतृत्व करेगा और उसी के अधीन समस्त जर्मन राज्यों को एकीकृत किया जायेगा साथ ही लोकतांत्रिक वैधानिक राजत्व के शासन सिद्धान्त को अपनाया जायेगा। परन्तु फ्रेडरिक, जो एक निरंकुश एवं रूढ़िवादी विचार का शासक था, ने उस व्यवस्था को मानने से इंकार कर दिया। क्योंकि वह स्पष्ट रूप से ऑस्ट्रियाई संघर्ष से बचना चाहता था। जर्मनी के कुछ अन्य दक्षिणी राज्य भी एकीकरण के इस प्रस्ताव के विरोध में थे। इस गतिरोध से एकीकरण का मार्ग अवरूद्ध हो गया साथ ही जर्मन राज्यों में विद्रोह की स्थिति पैदा हो गयी जिसे ऑस्ट्रिया और प्रशा ने मिल कर दबा दिया।

प्रशा अब तक समझा चुका था कि जर्मनी का एकीकरण उसी के नेतृत्व में हो सकता है। इसलिए उसने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी। इसी बीच फ्रेडरिक का देहान्त हो गया और उसका भाई विलियम प्रशा का शासक बना। विलियम राष्ट्रवादी विचारों का पोषक था। उसके सुधारों के फलस्वरूप जर्मनी में औद्योगिक क्रांति की हवा तेज हो गयी साथ ही आधारभूत संरचनाओं में भी काफी सुधार हुए। जिससे जर्मन राष्ट्रों को एकता के सूत्र में बांधने के प्रयास तेज हुए। विलियम ने एकीकरण के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर महान कूटनीतिज्ञ विस्मार्क को अपना चांसलर नियुक्त किया।

बिस्मार्क : 

  urop me rastrabaad

बिस्मार्क जो जर्मन डायट में प्रशा का प्रतिनिधि हुआ करता था, प्रारम्भ से ही हीगेल के विचारों से प्रभावित था और जर्मन संसद (डायट) में अपनी सफल कूटनीति का लगातार परिचय देता आ रहा था। वह निरंकुश राजतंत्र का समर्थन करते हुए जर्मनी के एकीकरण के प्रयास में जुट गया। यह उसकी कूटनीतिक सफलता थी कि चाहे उदारवादी राष्ट्रवादी हों या कट्टरवादी राष्ट्रवादी सभी उसे अपने विचारों का समर्थक समझते थे। विस्मार्क जर्मन एकीकरण के लिए सैन्य शक्ति के महत्व को समझता था। अतः इसके लिए उसने ‘रक्त और लौह की नीति’ का अवलम्बन किया। इसका तात्पर्य था कि सैन्य उपायों से ही जर्मनी का एकीकरण संभव था । उसने अपने देश में अनिवार्य सैन्य सेवा लागू कर दी । कालांतर में उसने 1830 के ऑस्ट्रिया प्रशा संधि का विरोध करना शुरू किया। जिसमें प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण नहीं किया जाना था। इस कारण अब प्रशा के नेतृत्व में जर्मन एकीकरण की भावना जोर पकड़ने लगी।

विस्मार्क ने अपनी नीतियों से प्रशा का सुदृढ़ीकरण किया और इस कारण प्रशा, ऑस्ट्रिया से किसी की मायने में कम नहीं रह गया। तब बिस्मार्क ने ऑट्रिया के साथ मिलकर 1864 ई० में श्लेविग और हॉलेस्टीन राज्यों के मुद्दे को लेकर डेनमार्क पर आक्रमण कर दिया।

क्योंकि उन पर डेनमार्क का नियंत्रण था। जीत के बाद श्लेशविग प्रशा के अधीन हो गया और हॉलेस्टीन ऑस्ट्रिया को प्राप्त हुआ। चूँकि इन दोनो राज्यों में जर्मनों की संख्या अधिक थी अतः प्रशा ने जर्मन राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़का कर विद्रोह फैला दिया। जिसे कुचलने के लिए ऑस्ट्रिया की सेना को प्रशा के क्षेत्र को पार करते हुए जाना था और प्रशा ने ऑस्ट्रिया को ऐसा करने से रोक दिया।

चूँकि विस्मार्क की नीति के अंतर्गत ऑस्ट्रिया से युद्ध करना अवश्यम्भावी था परन्तु वह ऑस्ट्रिया को आक्रमणकारी साबित करना चाहा था अतः पूर्व में ही उसने फ्रांस से समझौता कर लिया था कि ऑस्ट्रिया-प्रशा युद्ध में फ्रांस तटस्थ रहे। इसके लिए उसने फ्रांस को कुछ क्षेत्र भी देने का वादा किया। विस्मार्क ने इटली के शासक विक्टर इमैनुएल से भी संधि कर ली जिसके अनुसार ऑस्ट्रिया-प्रशा युद्ध में इटली ऑस्ट्रियाई क्षेत्रों पर आक्रमण कर देगा। अंततः अपने अपमान से क्षुब्ध ऑस्ट्रिया ने 1866 ई० में प्रशा के खिलाफ सेडोवा में युद्ध की घोषणा कर दी और ऑस्ट्रिया दोनो तरफ से युद्ध में फँस कर वह बुरी तरह पराजित हो गया इस तरह ऑस्ट्रिया का जर्मन क्षेत्रों पर से प्रभाव समाप्त हो गया और इस तरह जर्मन एकीकरण का दो तिहाई कार्य पूरा हो गया।

शेष जर्मनी के एकीकरण के लिए फ्रांस के साथ युद्ध करना आवश्यक था। क्योंकि जर्मनी के दक्षिणी रियासतों के मामले में फ्रांस हस्तक्षेप कर सकता था। इसी समय स्पेन की राजगद्दी का मामला उभर गया। जिस पर प्रशा के राजकुमार की स्वभाविक दावेदारी थी। परन्तु फ्रांस ने इस दावेदारी का खुलकर विरोध किया और प्रशा से इस संदर्भ में एक लिखित वादा मांगा। विस्मार्क ने इस बात को तोड़-मरोड़ कर प्रेस में जारी कर दिया। फलस्वरूप जर्मन राष्ट्रवादियों ने इसका खुल कर विरोध करना शुरू कर दिया। इससे चिढ़ कर 19 जून 1870 को फ्रांस के शासक नेपोलियन ने प्रशा के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और सेडॉन की लड़ाई में फ्रांसीसियों की जबर्दस्त हार हुई। तदुपरांत 10 मई 1871 को फ्रैंकफर्ट की संधि द्वारा दोनो राष्ट्रों के बीच शांति स्थापित हुई। इस प्रकार सेडॉन के युद्ध में ही एक महाशक्ति के पतन पर दूसरी महाशक्ति जर्मनी नगर के रूप का उदय हुआ। अंततोगत्वा जर्मनी 1871 तक एक एकीकृत राष्ट्र में यूरोप के राजनैतिक मानचित्र में स्थान पाया।

इस प्रकार राष्ट्रवाद ने सिर्फ दो बड़े राज्यों के को ही सुनिश्चित नहीं किया बल्कि अन्य यूरोपीय राष्ट्रों में भी इसके कारण राजनैतिक उथल-पुथल शुरू हुए। वस्तुतः इसके मूल में राष्ट्रीयता की भावना एवं लोकतांत्रिक विचारो का उदय था। हंगरी बोहेमिया तथा यूनान में स्वतंत्रता आन्दोलन इसी राष्ट्रवाद का परिणाम था। इसी के प्रभाव ने ओटोमन साम्राज्य के पतन की कहानी को अंतिम रूप दिया। बालकन क्षेत्र में राष्ट्रवाद के प्रसार ने स्लाव जाति को संगठित कर सर्बिया को जन्म दिया।

यूरोप में राष्ट्रवाद and यूनान में राष्ट्रीयता का उदय :-

इसी संदर्भ में यूनानी राष्ट्रीय आन्दोलन को देखा जा सकता है। यूनान का अपना गौरवमय अतीत रहा है। जिसके कारण उसे पाश्चात्य का मुख्य स्रोत माना जाता था। यूनानी सभ्यता की साहित्यिक प्रगति, विचार, दर्शन, कला, चिकित्सा विज्ञान आदि क्षेत्र की उपलब्धियाँ यूनानियों के लिए प्रेरणास्त्रोत थे। पुनर्जागरण के काल में इनसे प्रेरणा लेकर पाश्चात्य देशों ने अपनी तरक्की शुरू की। परन्तु इसके बावजूद भी यूनान तुर्की साम्राज्य के अधीन था।

फ्रांसीसी क्रांति से यूनानियों में राष्ट्रीयता की भावना की लहर जागी। क्योंकि धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर इनकी पहचान एक थी।

इसाई जगत ग्रीक आर्थोडॉक्स तथा रोमन कैथोलिक चर्च में विभक्त था । रूस तथा यूनान के लोग ग्रीक अर्थोडॉक्सचर्च के मानने वाले थे ।

फलतः तुर्की शासन से स्वयं को अलग करने के लिए आन्दोलन चलाये जाने लगे। इसके लिए इन्होने हितेरिया फिलाइक (Hetairia Philike) नामक संस्था की स्थापना ओडेसा नामक स्थान पर की। इसका उद्देश्य तुर्की शासन को यूनान से निष्काषित कर उसे स्वतंत्र बनाना था। क्रांति के नेतृत्व के लिए यूनान में शक्तिशाली मध्यम वर्ग का भी उदय हो चुका था।

यूनान सारे यूरोप वासियों के लिए प्रेरणा एवं सम्मान का पर्याय था। जिसकी स्वतंत्रता के लिए समस्त यूरोप के नागरिक अपनी सरकार की तटस्थता के बावजूद भी उद्यत थे। इंग्लैंड का महान कवि लार्ड बायरन यूनानियों की स्वतंत्रता के लिए यूनान में ही शहीद हो गया। इससे यूनान की स्वतंत्रता के लिए सम्पूर्ण यूरोप में सहानुभूति की लहर दौड़ने लगी। इधर रूस भी अपनी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा तथा धार्मिक एकता के कारण यूनान की स्वतंत्रता का पक्षधर था।

यूनान में विस्फोटक स्थिति तब और बन गई जब तुर्की शासकों द्वारा यूनानी स्वतंत्रता संग्राम में संलग्न लोगों को बुरी तरह कुचलना शुरू किया गया। 1821 ई० में अलेक्जेंडर चिपसिलांटी के नेतृत्व में यूनान में विद्रोह शुरू हो गया। रूस का जार अलेक्जेंडर व्यक्तिगत रूप से तो यूनानी राष्ट्रीयता के पक्ष में था परन्तु ऑस्ट्रिया के प्रतिक्रियावादी शासक मेटरनिख के दबाव के कारण खुल कर सामने नहीं आ पा रहा था। जब नया जार निकोलस आया तो उसने खुल कर यूनानियों का समर्थन किया। अप्रैल 1826 ई० में ग्रेट ब्रिटेन और रूस में एक समझौता हुआ कि वे तुर्की-यूनान विवाद में मध्यस्थता करेंगें। फ्रांस का राजा चार्ल्स X भी यूनानी स्वतंत्रता में दिलचस्पी लेने लगा। 1827 में लंदन में एक सम्मेलन हुआ जिसमें इंग्लैंड, फ्रांस तथा रूस ने मिलकर तुर्की के खिलाफ तथा यूनान के समर्थन में संयुक्त कार्यवाही करने का निर्णय लिया। इस प्रकार तीनो देशों की संयुक्त सेना नावारिनो की खाड़ी में तुर्की के खिलाफ एकत्र हुई। तुर्की के समर्थन में सिर्फ मिस्र की सेना ही आयी। युद्ध में मिस्र और तुर्की की सेना बुरी तरह पराजित हुई और अंततः 1829 ई० में एड्रियानोपल की संधि हुई। जिसके तहत तुर्की की नाममात्र की प्रभुता में यूनान को स्वायतता देने की बात तय हुई। परन्तु यूनानी राष्ट्रवादियों ने संधि की बातों को मानने से इंकार कर दिया। उधर इंग्लैंड तथा फ्रांस भी यूनान पर रूस के प्रभाव की अपेक्षा इसे स्वतंत्र देश बनाना बेहतर मानते थे। फलतः 1832 में यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया। बवेरिया के शासक ‘ओटो’ को स्वतंत्र यूनान का राजा घोषित किया गया। इस तरह यूनान पर से रूस का प्रभाव भी जाता रहा।

यूरोप में राष्ट्रवाद

हंगरी :

राष्ट्रवादी भावना के प्रसार का रूप हंगरी में भी नजर आता है। हंगरी पर आस्ट्रिया का पूर्णः प्रभुत्व था। 1848 की क्रांति के प्रभाव से यहाँ भी राष्ट्रीय आन्दोलन की शुरूआत हुई। जहाँ आन्दोलन का नेतृत्व ‘कोसूथ’ तथा ‘फ्रांसिस डिक’ नामक क्रांतिकारी के द्वारा किया जा रहा था। कोसूथ लोकतंत्रिक विचारों का समर्थक था उसने वर्गहीन समाज (Classless Society) की अपने विचारों को जनता तक पहुँचाना शुरू किया, जिस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। फ्रांस में लुई फिलिप के पतन का हंगरी के राष्ट्रवादी आन्दोलन पर विशेष प्रभाव पड़ा। कोसूथ ने आस्ट्रियाई आधिपत्य का विरोध करना शुरू किया तथा व्यवस्था में बदलाव की मांग करने लगा। इसका प्रभाव हंगरी तथा ऑस्ट्रिया दोनो देशों की जनता पर पड़ा। जिसके कारण यहाँ राष्ट्रीयता के पक्ष में आन्दोलन शुरू हो गए। अंततः 31 मार्च 1848 ई० को आस्ट्रिया की सरकार ने हंगरी की कई बातें मान ली। जिसके अनुसार स्वतंत्र मंत्रिपरिषद की मांग स्वीकार की गई। इसमें केवल हंगरी के सदस्य ही सम्मिलित किये गए। प्रेस को स्वतंत्रता दी गई तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सेना की स्थापना की गई। सामंती प्रथा समाप्त कर दी गई तथा प्रतिनिधि सभा (डायट) की बैठक प्रतिवर्ष राजधानी बुडापेस्ट में बुलाने की बात स्वीकार की गई। इस प्रकार इन आन्दोलनों ने हंगरी को राष्ट्रीय अस्मिता प्रदान की।

पोलैंड :

पोलैंड में भी राष्ट्रवादी भावना के कारण रूसी शासन के विरूद्ध विद्रोह शुरू हो गए। 1830 ई० की क्रांति का प्रभाव यहाँ के उदारवादियों पर भी व्यापक रूप से पड़ा थां परन्तु इन्हें इंग्लैंड तथा फ्रांस की सहायता नहीं मिल सकी। अतः इस समय रूस ने पोलैंड के विद्रोह को कुचल दिया।

बोहेमिया :

बोहेमिया जो आस्ट्रियाई शासन के अंतर्गत था में भी हंगरी के घटनाक्रम का प्रभाव पड़ा। बोहेमिया की बहुसंख्यक चैक जाति की स्वायत्त शासन की मांग को स्वीकार किया गया परन्तु

आन्दोलन ने हिंसात्मक रूप धारण कर लिया। जिसके कारण आस्ट्रिया द्वारा क्रांतिकारियों का सख्ती से दमन कर दिया गया। इस प्रकार बोहेमिया में होने वाले क्रांतिकारी आन्दोलन की उपलब्धियाँ स्थायी न रह सकीं।

परिणाम :

यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना का विकास तो फ्रांसीसी क्रांति के गर्भ से ही आरम्भ हुआ, जो मूर्त रूप में यूरोपीय राज्यों के एकीकरण के रूप में सामने आया। फलस्वरूप कई बड़े एवं छोटे राष्ट्रों का उदय हुआ। राष्ट्रवादी प्रवृतियों का नकारात्मक पक्ष 19 वीं शताब्दी के अंतिम उत्तरार्द्ध तक ‘संकीर्ण राष्ट्रवाद’ के रूप में उभर कर सामने आया। प्रत्येक राष्ट्र की जनता और शासक के लिए उनका राष्ट्र ही सब कुछ हो गया। इसके लिए वे किसी हद तक जाने के लिए तैयार रहने लगे। इसके परिणमस्वरूप बाल्कन क्षेत्र के छोटे-छोटे राज्यों एवं जातीय समूहों में भी यह भावना जोर पकड़ने लगी। दूसरी तरफ बड़े यूरोपीय राज्यों यथा, जर्मनी, इटली, फ्रांस, इंग्लैंड जैसे देशों में राष्ट्रवाद की भावना इतनी बढ़ गई कि उनमें साम्राज्यवादी प्रवृतियों का प्रादुर्भाव होने लगा। हालाँकि इन साम्राज्यवादी प्रवृतियों के लिए यूरोप में होने वाली औद्योगिक क्रांति उतती ही जिम्मेवार थी जितने कि अन्य कारण थे। इस प्रवृति ने सर्वप्रथम एशियाई एवं अफ्रीकी देशों को अपना निशाना बनाया। जहाँ यूरोपीय देशों ने अपने उपनिवेश स्थापित किये। इन उपनिवेशों के शोषण पर ही औद्योगिक क्रांति की आधारशिला टिकी थी। इस साम्राज्यवादी प्रवृति के कारण ही ओटोमन साम्राज्य ध्वस्त हुआ और पूरा बाल्कन क्षेत्र युद्ध का अखाड़ा बन गया।

यूरोप में राष्ट्रवाद के इस प्रादुर्भाव ने यूरोप ही नहीं वरनृ पूरे विश्व को जागरूक बनाया। जिसके कारण अफ्रीकी एवं एशियाई उपनिवेशों में विदेशी सत्ता के खिलाफ मुक्ति के लिए राष्ट्रीयता की लहर उपजी। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत में भी यूरोपीय राष्ट्रवाद के संदेश पहुँचने शुरू हो चुके थे। मैसूर का शासक टीपू सुल्तान स्वयं 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से काफी प्रभावित था। इसी प्रभाव में उसने भी जैकोबिन क्लब की स्थापना करवाई तथा स्वयं उसका सदस्य बना। यह भी कहा जाता है कि उसने श्रीरंगपट्टम में ही स्वतंत्रता का प्रतीक ‘वृक्ष’ भी लगवाया था। दूसरी तरफ 19 वीं शताब्दी में चलने वाले सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलनों के नेताओं ने भी भारत में राष्ट्रीय चेतना को जगाना शुरू किया। उदाहरणस्वरूप राजाराम मोहन राय स्वयं अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं में काफी रूचि लेते थे। उन्होने स्वतंत्रता, जनवाद एवं राष्ट्रवाद संबधी अपने विचारों के कारण ही 1821 ई० की नेपल्स की क्रांति की विफलता पर काफी दुःख प्रकट किया एवं 1823 ई० की स्पेनिश स्वतंत्रता आन्दोलन की सफलता पर उत्सव भोज दिया। कालांतर में भारत में 1857 की क्रांति से ही राष्ट्रीयता के तत्व नजर आने लगे थे।

इस प्रकार यूरोप में जन्मी राष्ट्रीयता की भावना ने प्रथमतः यूरोप को एवं अंततः पूरे विश्व को प्रभावित किया। जिसके फलस्वरूप यूरोप के राजनैतिक मानचित्र में बदलाव तो आया ही साथ-साथ कई उपनिवेश भी स्वतंत्र हुए।

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